एक भ्रमर आसक्ति _______________________________________ प्रिय प्रेम का,दिलसाज नेक पुजारी, तू मेरे हृदय की प्रेम प्रेरित फुलवारी। जाने अनजाने वैरूखी के मौसम में, मैं कब मधुप आसक्ति बन जाऊं। आंगन के, मुस्कुराहट के प्रसूनों में, गुंजायमान हो रस चुन चुन लें जाऊं। रस सगर का भ्रमण कर रस नगर में, हर्षातिरेक हो गगन में मुक्त हो जाऊं। स्वप्न भरी स्मृति के मधुर मारूत में, आशा आकांक्षा से कल्पित गेहूं बनाऊं। समर्पण लिए समर्पित कमनीय कंठ में, अनुराग राग आलाप का भ्रमित हो जाऊं। सुनील सिंधवाल'रोशन'उत्तराखंडी 05/06/1986